आजकल हम बहुत ग़मज़दा रहते हैँ,
खुद अपने आप से खफ़ा खफ़ा रहते हैँ,
रह गये उजालोँ के सब मंज़र बहुत पीछे,
अब तो बस अंधेरे ही अंधेरे यहाँ रहते हैँ !
कोई अपना न रहा हम किसी के रहे,
कसमेँ वादेँ कल के अब न जाने कहाँ रहते हैँ !
हमने तो बस पत्थर ही पाये इस दुनिया मेँ ,
हम न जान पाये कहाँ खुदा रहते हैँ !